Tuesday, June 7, 2016

कांच की बोतल में बंद तकदीर मेरी...


कांच की बोतल में बंद तकदीर मेरी, 
हर पल मुझे मेरी औकात याद कराती है।
मैं जितना भी मजबूर हो जाऊं दिल से अपने, 
फिर भी दिल पे ही हर बात आ जाती है।
सिर्फ प्यार के दो बोल की खातिर किसी पर सब कुछ लुटा दूं, 
लुट कर भी प्यार की ही तलब फिर से लग जाती है।
फिर वही उस कांच की बोतल में, 
मेरी तकदीर आकर बंद हो जाती है।

{अमरदीप सिंह}

Friday, May 13, 2016

मौत सस्ते दाम मिल जाती है.....


तमाम कोशिशें नाकाम हो जाती हैं,
जिन्दगी जब किसी मुकाम पर बदनाम हो जाती है।
ठोकरें लगने लगती है हर पल हर मोड़ पर,
चोट लगने की बात दिल पर आम हो जाती है।
अक्सर दिल अपना समझ भरोसा कर बैठता है जरूरत से ज्यादा किसी पर,
फिर सारा भरोसा सारी आस एक पल में बेनाम हो जाती है।
मौत को गले लगा भला किसी को आज तक सकून मिला नहीं यह सब जानते हैं,
फिर भी रास्ता मौत का चुनते है क्यों कि मौत सस्ते दाम मिल जाती है।

>>>अमरदीप सिंह<<<

Wednesday, November 18, 2015

है नही अब मुझमें इतनी हसरत कि खुद को किसी के काबिल बना दे...



है नही अब मुझमें इतनी हिम्मत कि फिर से अपने दिल में किसी को जगह दे,
है नही अब मुझमें इतनी हसरत कि खुद को किसी के काबिल बना दे।
एक ही दुआ मांगी थी रब से कि उनको मेरा बना दे,
हसर हुआ ऐसा कि कोई मुझे पल के लिए भी ना पनाह दे।
पूछ लिया मैंने अपने रब से कहीं तो मुझको जगह दे,
कह दिया रब ने, जन्नत या जहन्नुम जाने की तू कोई तो मुझको वजह दे।।

{ अमरदीप सिंह }

Tuesday, November 17, 2015

हम भी जज्बातों में बह गए होंगे....


माना किसी के जज्बातों के साथ खेलना उनका पेशा रहा होगा,
हम भी जज्बातों में बह गए होंगे।
दिल में अपने उन्हें जगा देकर,
हम खुद दिल तक उनके ना पहुंचे होंगे।
प्यार वो भी हमसे करते है ऐसा झूठ ही कहा था उन्होंने,
उस झूठ को ही सही कभी तो वो याद किया करते होंगे।
आज वो खुश है किसी के साथ अपनी दुनिया में,
हम भी खुश होंगे अपनी दुनिया में ऐसा वो सोचा करते होंगे।।

{ अमरदीप सिंह }

Tuesday, October 20, 2015

बत्तमीज हूँ, बेरूखा हूँ, कड़वीं बातें करता हूँ अक्सर...


कटती नहीं जो जिन्दगी यूँ आसानी से,
उसे जीने की कोशिश करता हूँ। 
जीता हूँ जिनके साथ अपनी मनमानी से,
उनकी ख्वाहिशे पूरी करने की कोशिश करता हूँ। 
बत्तमीज हूँ, बेरूखा हूँ, कड़वीं बातें करता हूँ अक्सर,
दुनिया जो सुनना पसंद नही करती, वो सच बोलने की कोशिश करता हूँ।।

{ अमरदीप सिंह }

Monday, October 12, 2015

देख कर चोट का निशां उनके होठों पर...


देख कर चोट का निशां उनके होठों पर, आज ये एहसास हुआ कि..
कांटो में खिला वो ख़ूबसूरत गुलाब कितने दर्द झेलता होगा।।

{ अमरदीप सिंह }

Friday, October 9, 2015

इजहार करना भी मुश्किल हो जाता है....


ना सुनने के डर से इजहार करना भी मुश्किल हो जाता है,
पास हो वो चाहे जिसे दिल, प्यार करना मुश्किल हो जाता है।
दिल धड़कता है जोर जोर से करीब उनके जाने से, 
इजहार करके कहीं दूर ना चले जाए वो, ये सोच कर सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है।।

{ अमरदीप }

ए ज़िंदगी मुझसे यूँ दगा ना कर....



ए ज़िंदगी मुझसे यूँ दगा ना कर,
मैं जिन्दा रहूँ हमेशा ये दुआ ना कर। 
कोई देखता है उन्हें तो जलन होती है मुझको,
ए हवा तू भी उन्हें ज्यादा छुआ ना कर।

{ अमरदीप }

Wednesday, September 23, 2015

मैं वो परिंदा जो अब उड़ना चाहता हूँ...


मैं वो परिंदा जो अब उड़ना चाहता हूँ,
वापिस ना अपने घर कभी मुड़ना चाहता हूँ।
हार चूका, थक चूका अब टूट गया हूँ,
है नहीं अब कोई अपना, सबसे छूट गया हूँ।
किया जिनके लिए उन्होंने मुझे नाकारा समझा,
जीने चला जिसके संग, उसने ही आवारा समझा।
नहीं है चाह अब जिंदगी में कुछ करने की,
किसे है परवाह इस दुनिया अब जीने मरने की।

मैं वो परिंदा जो अब उड़ना चाहता हूँ,
वापिस ना अपने घर मुड़ना चाहता हूँ।।

पल पल हर पल अब कटने लगा हूँ,
जिंदगी की सच्चाई से भटकने लगा हूँ। 
उम्मीद की जिस जिस से सिर्फ प्यार की,
उन सब को हर वक़्त अब मैं खटकने लगा हूँ।
पहले दोस्तों की फिर अपनों की फिर उनकी नज़रों से गिरा,
आज मुकाम वो आया की खुद की नज़रों से गिरने लगा हूँ। 
मैं वो परिंदा जो अब उड़ना चाहता हूँ,
वापिस ना अपने घर मुड़ना चाहता हूँ।।

{अमरदीप सिंह }

Sunday, November 2, 2014

हम ही रिश्ते का लिहाज़ कर बैठे....


क्या मजाल थी उनकी कि, 
वो इतना कुछ कह जाते।  
ये तो हम ही रिश्ते का लिहाज़ कर बैठे,
फिर नफरत सहना तो अपना मुकद्दर है।।  

<<< अमरदीप सिंह <<< 

Wednesday, September 18, 2013

अपनी ये हकीकत किसको दूँ।।


दर्द-ए-दिल की अपनी ये विरासत किसको दूँ,
तन्हाईयों से लिपटी अपनी ये चाहत किसको दूँ,
हमने तो हर रिश्तों से ठोकरे ही खायी है अब तलक, 
ठोकरों से भरी अपनी ये हकीकत किसको दूँ।।


>>>>अमरदीप<<<<

Friday, November 2, 2012

खुदा ही गवाह था मेरे ज़ख़्मी दिल का.....


ना अब तक पता था उन्हें मेरे हाल-ए-दिल का ,
खुदा ही गवाह था मेरे ज़ख़्मी दिल का.....
ना गौर से देखा कभी उन्होंने मेरी तनहाई को,
मै ही चल पड़ा था थाम के उनकी परछाई को....
इक जोत जगाई थी फिर से मैंने अपने दिल में,
पता ना था, हम भी शामिल थे उनके कातिल में....





                                                     >>>>अमरदीप<<<< 

बड़ी शिद्दत से उसे मै याद आता होगा...


इश्क में हर बार लुटना मेरा मुक़द्दर था,
मेरा गम ही मेरी जिन्दगी का सिकंदर था.. 
मेरा मुरशद भी मुझसे यही चाहता होगा,
बड़ी शिद्दत से उसे मै याद आता होगा..
ना जिक्र आता होगा उनकी बातो में अब मेरा,
अब तो उनका दिल भी ना रहा मेरा बसेरा..


>>>>अमरदीप<<<<

Wednesday, October 31, 2012

अक्सर उनका फांसला बढ़ता ही गया...



उनके ज़ख़्म इतने गहरे थे की, 
जब भी मैंने उनकी खातिर मरहम बनना चाहा,
तो अक्सर उनका दर्द बढ़ता ही गया...
उनके राह में इतने पहरे थे की,
जब भी मैंने उन तक बढ़ना चाहा,
तो अक्सर उनका फांसला बढ़ता ही गया...



>>>>अमरदीप<<<<

Monday, October 15, 2012

पहले आते है लोग जिन्दगी में हसीन वादों के साथ...


पहले आते है लोग जिन्दगी में हसीन वादों के साथ, 
फिर छोड़ जाते है हमें तनहा यादों के साथ, 
हम खुद को कोसतें है फिर तमाम उम्र,
आखिर समझौता करना ही पड़ता है उन इरादों के साथ.....

>>>>अमरदीप<<<<

Friday, October 12, 2012

मै मुजरिम हा तेरा मेरा दुश्मन है गवाह...


नहीं जीना नहीं जीना हुन मैनू तेरे बिना,
मै मुजरिम हा तेरा मेरा दुश्मन है गवाह..
तू बदली तू बदली तेरी शातिर सी अदा,
मै आशिक सी तेरा ना तुझसे मै जुदा..
तू कमली मै कमला जो दोस्ती गये भुला,
आजा वापिस मुड़ के अब और ना रुला..
ऐ अल्लाह, ऐ मौला, मेरी गलती तो बता,
गुस्ताख हूँ मै तो मुझे अपने पास बुला..
ना समझा ना जाना मै, हुन होना है आगाह,
मै कातिल सी अपना, मेरी वखरी है निगाह.. 
नहीं जीना नहीं जीना हुन मैनू तेरे बिना,
मै मुजरिम हा तेरा मेरा दुश्मन है गवाह..........

>>>>अमरदीप<<<<

Friday, October 5, 2012

मेरी 'सोणी' इतनी मतलबपरस्त ना थी.......


ना चाहत है मुझे उन सपनो की, 
जिसमे तेरा एहसान हो मुझपर... 

तेरी एक ना की खातिर मैंने,
अपनी तकदीर बदल डाली... 
खुद से ज्यादा यकीन और,
दिल को बड़े अरमान थे तुझपर...
तेरी हर ख़ुशी की खातिर मैंने,
अपने हाथो की लकीर बदल डाली...
तू बदली, बदला तेरा दिल ऐ 'सोणी',
तुने तो मेरी कायनात ही बदल डाली...
बदला मेरा दिन, बदली मेरी रात,
बदलते गये मेरे हर वो जज्बात... 
ना चाहत है मुझे अब तेरे सपनो की,
जिसमे तेरा एहसान हो मुझपर... 

ना पूछी तुने मुझसे मेरी रजा,
खुद ही फैसला कर हकीकत बयां कर डाली..
अपना रास्ता सीधा और आसां कर,
मेरी राह में कई मशक्कत दे डाली... 
मेरी 'सोणी' इतनी मतलबपरस्त ना थी,
जो तुने उसकी हस्ती बदल डाली... 
अब ना आदत है मुझे तेरी यादो की,
जो 'सोणी' तुने रहने ना दी मुझ पर.... 
ना चाहत है मुझे अब तेरे सपनो की,
जिसमे तेरा एहसान हो मुझ पर... 


>>>>अमरदीप<<<< 

Saturday, September 15, 2012

नही खोना चाहता खुद को रास्ता-ए-गुमनाम से पहले...


जुबां पर नाम आया जो खुदा के नाम से पहले,
हर जगह बदनाम पाया मुझे उनके अंजाम से पहले..
जिस शराब को कभी छुआ भी नही था इन कमबख्त हाथों ने,
दो चार बाटली यु ही, पी जाते है दोस्त के एक जाम से पहले..
सारा दिन ये आँखे उनकी जुदाई के नशे में रहती है,
फिर शराब भी आंसू बन कर बहती है हर शाम से पहले..
पहले अपनों ने, फिर उन्होंने खेला इस नाजुक दिल से,
अब तो दोस्त भी ना पूछते हमे, किसी काम से पहले..
जन्नत या जहन्नुम को तक़दीर बना लू अब बस,
नही खोना चाहता खुद को रास्ता-ए-गुमनाम (गुमनाम रास्तो में) से पहले.. 

>>>>अमरदीप<<<<

Thursday, September 13, 2012

तेरे हर दर्द में बराबर का हक़दार हूँ....


तेरी ख़ामोशी में कई गम है,
तेरी आँखे कुछ कुछ नम है..
इस हाल में तुझे यूँ ना छोडूंगा अकेला,
जानता हूँ मुझ पर तेरा यकीं कम है..
तेरे हर दर्द में बराबर का हक़दार हूँ,
इस दोस्ती का हमेशा मैं कर्ज़दार हूँ..
तू लाख छुपा ले अपने ज़ख़्म मुझसे,
कुछ कुछ तो मैं भी समझदार हूँ.... 

>>>>अमरदीप<<<<

Wednesday, September 12, 2012

सावन की जब खबसूरत शाम होती है....


सावन की जब खबसूरत शाम होती है,
नैनो की नैनो से तब बात होती है..
शमा जलाये सर्द की रात में,
इक यादगार मुलाकात होती है..
कुछ शरारत उनकी होती है,
कुछ लम्हों की ताक होती है..
दिल धडकता है जोरो से,
चाहत भी कुछ ख़ास होती है..
वो चाह कर भी भूल ना पाए हमे,
नीयत भी ना साथ होती है..
''अमरदीप'' कहता है, खुद को रोक ऐ आशिक, 
तब ना होश होता है ना मात होती है.. 

>>>>अमरदीप<<<<