Tuesday, May 15, 2012

प्यार अगर खुदा होता....


प्यार अगर खुदा होता, तो मेरा यार कभी ना मुझसे जुदा होता..   
मै भी हरदम हँसता खेलता, मेरी आँख में आंसू का नमूना ना होता..
जब भी वो आते जीने की राह दिखती,  उनके जाते ही मेरा घर सुना ना होता.. 
अब तो दिन और रात भी अपने ना रहे,  वक़्त का यूँ बेवफा होना ना लगता..
"अमरदीप"आज भी उनकी राह ताकता है, अब ये जग मुझे किनारा या कोना ना लगता..


>>अमरदीप<<

Friday, May 4, 2012


Ik Patthar Nu pooj pooj k koi usnu khuda nhi kar sakda,
Meri Sahiba nu Botal ch band karke usnu mere to tu juda nhi kar sakda.
Mai Mirza nhi ho sakya kise jamane da ta ki hoya,
sahiba de bharava nu maar k , mai v gunaah nhi kar sakda......


Amardeep Singh 

Thursday, April 26, 2012

मै तो आशिक हूँ दीवाना ना बनाना मुझको....


कच्ची दिवार हूँ  ठोकर ना लगाना मुझको,
अपनी नज़रो में बसाकर ना गिरना मुझको,
तुमने आँखों में तस्वीर की तरह रखता हूँ,
दिल में धड़कन की तरह तुम भी बसना मुझको,
बात करने में जो मुश्किल हो तुम्हे महफ़िल में,
मै समझ जाऊँगा नजरो से बताना मुझको,
वादा उतना ही करो जितना निभा सकते हो,
ख्वाब पूरा जो ना हो वो ना दिखाना मुझको.
अपने रिश्ते की नजाकत का भरम रख लेना,
मै तो आशिक हूँ दीवाना ना बनाना मुझको,
कच्ची दिवार हूँ  ठोकर ना लगाना मुझको,
अपनी नज़रो में बसाकर ना गिरना मुझको.... 

Saturday, April 21, 2012

कुछ हकीकत है....




 मेरे लिखने में इक शरारत है, 

मुझमे लिखने की इक लत(आदत) है,

अकसर कुछ बयाँ करने की कोशिश करता हूँ, 

समझ के देखो तो मेरे लिखने में कुछ हकीकत है....  

Friday, April 6, 2012

वो सब ख्वाब था....

इस सजा का मै खुद हकदार था,
बेवफा अगर तुम ना थे, तो बेवफा मै भी ना था,
कितनी मोहब्बत थी हम दोनों के दिलो में
और कितना खुबसूरत अरमान था,
नींद से जागा और पता चला की
हकीकत कुछ और थी और वो सब ख्वाब था.....

अमरदीप सिंह

Tuesday, August 16, 2011

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया..

गुनाहों पे गुनाह कर मै गुनहगार बन गया..

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया...

जब उम्र थी मेरे हसने खेलने की, तो कांटो पे चलता रहा और,

वक़्त से पहले ही मै बड़ा और समझदार बन गया..

गुनाहों पे गुनाह कर मै गुनहगार बन गया..

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया...

Thursday, July 14, 2011

गलियों में आना जाना भूल गए........

नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए
सबने ढूँढे अपने रस्ते साथ निभाना भूल गए।

शाम ढले इक रोशन चेहरा क्या देखा इन आँखों ने
दिल में जागीं नई उमंगें दर्द पुराना भूल गए।

ईद, दशहरा, दीवाली का रंग है फीका-फीका सा
त्योहारों में इक दूजे को गले लगाना भूल गए।

वो भी कैसे दीवाने थे खून से चिट्‍ठी लिखते थे
आज के आशिक राहे-वफा में जान लुटाना भूल गए।

बचपन में हम जिन गलियों की धूल को चंदन कहते थे।
बड़े हुए तो उन गलियों में आना जाना भूल गए।

शहर में आकर हमको इतने खुशियों के सामान मिले
घर-आँगन, पीपल-पगडंडी, गाँव सुहाना भूल गए।