Thursday, April 26, 2012

मै तो आशिक हूँ दीवाना ना बनाना मुझको....


कच्ची दिवार हूँ  ठोकर ना लगाना मुझको,
अपनी नज़रो में बसाकर ना गिरना मुझको,
तुमने आँखों में तस्वीर की तरह रखता हूँ,
दिल में धड़कन की तरह तुम भी बसना मुझको,
बात करने में जो मुश्किल हो तुम्हे महफ़िल में,
मै समझ जाऊँगा नजरो से बताना मुझको,
वादा उतना ही करो जितना निभा सकते हो,
ख्वाब पूरा जो ना हो वो ना दिखाना मुझको.
अपने रिश्ते की नजाकत का भरम रख लेना,
मै तो आशिक हूँ दीवाना ना बनाना मुझको,
कच्ची दिवार हूँ  ठोकर ना लगाना मुझको,
अपनी नज़रो में बसाकर ना गिरना मुझको.... 

Saturday, April 21, 2012

कुछ हकीकत है....




 मेरे लिखने में इक शरारत है, 

मुझमे लिखने की इक लत(आदत) है,

अकसर कुछ बयाँ करने की कोशिश करता हूँ, 

समझ के देखो तो मेरे लिखने में कुछ हकीकत है....  

Friday, April 6, 2012

वो सब ख्वाब था....

इस सजा का मै खुद हकदार था,
बेवफा अगर तुम ना थे, तो बेवफा मै भी ना था,
कितनी मोहब्बत थी हम दोनों के दिलो में
और कितना खुबसूरत अरमान था,
नींद से जागा और पता चला की
हकीकत कुछ और थी और वो सब ख्वाब था.....

अमरदीप सिंह

Tuesday, August 16, 2011

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया..

गुनाहों पे गुनाह कर मै गुनहगार बन गया..

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया...

जब उम्र थी मेरे हसने खेलने की, तो कांटो पे चलता रहा और,

वक़्त से पहले ही मै बड़ा और समझदार बन गया..

गुनाहों पे गुनाह कर मै गुनहगार बन गया..

तेरी थोड़ी सी मोहब्बत पे, मै तेरा कर्ज़दार बन गया...

Thursday, July 14, 2011

गलियों में आना जाना भूल गए........

नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए
सबने ढूँढे अपने रस्ते साथ निभाना भूल गए।

शाम ढले इक रोशन चेहरा क्या देखा इन आँखों ने
दिल में जागीं नई उमंगें दर्द पुराना भूल गए।

ईद, दशहरा, दीवाली का रंग है फीका-फीका सा
त्योहारों में इक दूजे को गले लगाना भूल गए।

वो भी कैसे दीवाने थे खून से चिट्‍ठी लिखते थे
आज के आशिक राहे-वफा में जान लुटाना भूल गए।

बचपन में हम जिन गलियों की धूल को चंदन कहते थे।
बड़े हुए तो उन गलियों में आना जाना भूल गए।

शहर में आकर हमको इतने खुशियों के सामान मिले
घर-आँगन, पीपल-पगडंडी, गाँव सुहाना भूल गए।

Monday, June 20, 2011

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था...


उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर' हँस के बिठाया था जिसे.........

Thursday, May 26, 2011

ये 'इश्क' है क्या , जरा कोई मुझको समझाए....................

ये 'इश्क' है क्या , जरा कोई मुझको समझाए,
करके 'इश्क,' हीरा-रांझा और लैला-मजनू जैसे क्यों या एक हो पाए,

है ये कैसा ज़ख़्म जो भरने के बाद भी दर्द पहुंचाए,
मिले तो जन्नत और छोड़े तो जहन्नुम का एहसास दिलाये,

इक 'इश्क' की खातिर सारी दुनिया बुरी बन जाये,
क्यों आज भी 'इश्क' को बदनाम निगाहों से देखा जाता है,

वो दुनिया कहा है जहा 'इश्क' सबका अमर जो जाये,
कहता है "अमरदीप', समझे और औरो को भी समझाए,

इश्क करना है तो पत्थर से करो, जो कभी न कभी मोम बन जाये,
क्योकि इंसान वो चीज़ है जो इश्क करने के बाद पत्थर बन जाये,

ये 'इश्क' है क्या , जरा कोई मुझको समझाए....................